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जन्म से ही बच्चों के हावभाव बताते हैं उनके शारीरिक व मानसिक विकास




- जन्म के बाद नवजातों की निगरानी के लिए फ्रंटलाइन वर्कर्स करते हैं गृहभ्रमण
- दो, चार, छह, नौ व 12वें माह में दिखते हैं शिशुओं में होने वाले बदलाव

बक्सर | जिले में नवजात बच्चों की निगरानी के लिए फ्रंट लाइन वर्कर्स लगातार निगरानी करते हैं। ताकि, उनके जन्म से एक वर्ष तक के होने तक सभी चीजों का अनुश्रवण किया जा सके। शिशु की गतिविधियों से उसके विकास का अंदाजा लगया जाता है। साथ ही, उसकी अन्य शारीरिक क्रियाओं से भी उसके विकास की गति की परख की जाती है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों व स्कूलों में साल में क्रम्रश: एक और दो बार शिविर लगाया जाता है, जिसमें बच्चों की पूरी जांच की जाती । इसके अलावा इस दौरान शिशु के क्रियाकलापों से उसकी विकास की गति की परख की जा सकती है।
जन्म के बाद से सिर और गर्दन का विशेष ख्याल जरूरी : 
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. आरबी श्रीवास्तव ने बताया, शिशुओं के जन्म के बाद से ही विशेष ख्याल रखना पड़ता है। खासकर शुरुआती दिनों में नवजात शिशु के सिर का विशेष ख्याल रखना होता है। इस वक्त शिशु को सिर्फ एक ही तरह से सुलाना चाहिए, ताकि उनके सिर पर खास दबाव न पड़े। विशेषकर शिशु के सिर का मूवमेंट चार से पांच माह के होने के बाद उनका सिर ठीक से घूमने लगता है। वहीं जन्म के दूसरे माह की सबसे बड़ा घटना शिशु की मुस्कान होती है। वह लोगों की बातों की ओर ध्यान भी देने लगता है। पहले माह में लगभग 20 घंटे और उसके बाद एक बार में थोड़े लंबे समय के लिए नवजात सोते हैं। 
निर्धारित अवधि में शिशु में होता है  बदलाव:
चार माह के होने पर शिशु की दृष्टि लगातार बढ़ती रहती है। छह माह होने पर वह अब अपनी आखों और व्यवहार से गुस्से और प्रतिक्रिया को व्यक्त करेगा। इस उम्र में वह रोने के साथ-साथ संचार के अन्य तरीके भी सीखेगा। नौ महीने के बच्चा कुछेक कदम चलने लगेगा। 12वें माह यानी एक साल का होते ही शिशु के खेलने के तरीके में बदलाव आ जाता है। अब शिशु चीजों को उठाने और छोटी वस्तुओं को हाथ में लेकर घुमाना फिराना शुरू कर देगा। अब वह अपने पसंदीदा खेल पहले से ज्यादा शोर करके  खेलेगा। चीजों को धकेलने, फेंकने और नीचे गिरा देना उसके लिए मजेदार होगा है। दूसरों को अपने खेल में शामिल करेगा। अकेले रहने पर रोने लगेगा। यह सब क्रिया स्वस्थ रहते हुए बच्चा कर रहा है तो समझें कि वह सामान्य और सही रूप से बड़ा हो रहा है।
निगरानी के दौरान कुपोषित बच्चों की भी होती है पुष्टि : 
डुमरांव स्थित कोड संख्या 47 आंगनबाड़ी केंद्र की सेविका लीलावती देवी ने बताया कि जिन महिलाओं का संस्थागत प्रसव कराया जाता है, उनकी नियमित निगरानी की जाती । इस क्रम में आशा कार्यकर्ता भी गृह भ्रमण कर बच्चों और प्रसूताओं की निगरानी करती हैं । यदि किसी नवजात में किसी प्रकार की परेशानी पाई जाती है, तो उसकी सूचना वरीय अधिकारियों और चिकित्सकों को दी जाती । ताकि, नवजात का इलाज किया जा सके। कई बार निगरानी में कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की पुष्टि भी होती है, जिनको पीएचसी के माध्यम से रेफर कराकर एनआरसी में भर्ती कराया जाता ।



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