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पूर्व बक्सर सदर विधायक संजय तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी ने बजट को बताया बिहार व जनविरोधी


बक्सर । पूर्व बक्सर सदर विधायक संजय तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी ने सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे बिहार विरोधी और जनविरोधी करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह बजट न तो बक्सर की ज़रूरतों को समझता है और न ही बिहार की पीड़ा को। आम जनता को इस बजट से किसी तरह की राहत नहीं मिली, बल्कि निराशा ही हाथ लगी है।


उन्होंने कहा कि बिहार की शिक्षा और रोजगार के साथ एक बार फिर गंभीर अन्याय किया गया है। वर्षों से चली आ रही मांग के बावजूद पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा न दिया जाना यह दर्शाता है कि सरकार बिहार के छात्रों के प्रति गंभीर नहीं है। संजय तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी ने कहा कि “शिक्षा मज़बूत होगी तभी समाज और प्रदेश मज़बूत होगा”, लेकिन इस बजट में शिक्षा को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है और उच्च शिक्षण संस्थानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया गया है।

किसानों को लेकर उन्होंने कहा कि बजट पूरी तरह खोखला साबित हुआ है। न सिंचाई की स्थायी व्यवस्था की कोई ठोस योजना है और न ही फसलों के वाजिब दाम की गारंटी। खाद, बीज और डीज़ल के बढ़ते खर्च से किसानों को राहत देने का कोई प्रावधान नहीं है। बक्सर सहित पूरे बिहार के किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

युवाओं के विषय में उन्होंने कहा कि बजट में केवल घोषणाएँ और भाषण हैं। ज़मीन पर नौकरी देने की कोई ठोस योजना नहीं है। बेरोज़गारी रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन सरकार युवाओं के भविष्य को लेकर असंवेदनशील दिखाई दे रही है। यह बजट युवाओं के सपनों पर सीधा हमला है।





पूर्व विधायक ने कहा कि यह बजट आम आदमी का नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा लोगों का बजट है। कांग्रेस पार्टी जनसंघर्ष की विचारधारा पर चलते हुए इस जनविरोधी बजट का पुरज़ोर विरोध करेगी और जनता की आवाज़ सड़क से लेकर सदन तक मजबूती से उठाती रहेगी।

उन्होंने आगे कहा कि बजट पेश होने के दौरान निवेशकों के करीब 8 लाख करोड़ रुपये डूब जाना यह दर्शाता है कि केंद्रीय नेतृत्व पर आम निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है। सोना-चांदी के थोक दामों में लगातार बढ़ोतरी और बजट से पहले हुई बिकवाली ने शादी-विवाह के मौसम में आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों से देश में अस्थिरता बढ़ी है और छोटे व मझोले उद्योग बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं। कपड़ा, सिलाई और निर्माण उद्योग को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता थी, लेकिन बजट में इन क्षेत्रों को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।







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