बक्सर । जय भोलेनाथ ग्रुप एवं पांडा समाज के तत्वावधान में श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर, रामरेखाघाट परिसर में चल रही श्रीराम कथा के आठवें दिन प्रेमाचार्य पीताम्बर महाराज ने श्रीराम-भरत मिलाप का मार्मिक प्रसंग सुनाया। भगवान श्रीराम और भरत के अटूट प्रेम, त्याग एवं भाईचारे का प्रसंग सुनकर कथा में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
कथा व्यास प्रेमाचार्य पीताम्बर महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम के वनवास जाने और राजा दशरथ के निधन के बाद भरत अयोध्या लौटे। श्रीराम के वनगमन की जानकारी मिलते ही भरत अत्यंत व्यथित हो गए। उन्होंने प्रभु श्रीराम को अयोध्या वापस लाने का संकल्प लिया और अयोध्यावासियों के साथ चित्रकूट पहुंचे।
चित्रकूट में श्रीराम को देखते ही भरत भावुक होकर उनके चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। भरत ने प्रभु श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह किया, लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन को सर्वोच्च मानते हुए अपना वनवास पूरा करने का संकल्प दोहराया।
महाराजश्री ने कहा कि भरत का त्याग और श्रीराम के प्रति उनका प्रेम भाईचारे की अनुपम मिसाल है। भरत ने श्रीराम के स्थान पर स्वयं राजसिंहासन स्वीकार करने के बजाय उनकी खड़ाऊं को अयोध्या का प्रतीक बनाया। श्रीराम ने भी भरत के प्रेम और समर्पण को देखते हुए अपनी खड़ाऊं उन्हें सौंप दी।
कथा के दौरान जैसे ही ‘राम भक्त ले चला राम की निशानी, शीश पर खड़ाऊं, अंखियों में पानी’ भजन गूंजा, श्रद्धालु भावुक हो उठे। पूरा कथा परिसर जय श्रीराम के जयघोष और भक्ति के वातावरण से गुंजायमान हो गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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