बक्सर । ब्रह्मपुर प्रखंड अंतर्गत रघुनाथपुर स्थित तुलसी आश्रम को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू हो गई है। तुलसी विचार मंच के संयोजक शैलेश ओझा ने तुलसी आश्रम को बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद से जोड़ने की मांग की है। उनका कहना है कि धार्मिक न्यास पर्षद से जुड़ने के बाद आश्रम को सरकार की धार्मिक एवं पर्यटन योजनाओं का लाभ मिलेगा, जिससे इसके समुचित विकास के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
इस क्रम में शैलेश ओझा एवं भाजपा कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के प्रदेश सह संयोजक शंभू चंद्रवंशी ने बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष रणवीर नंदन से मुलाकात कर तुलसी आश्रम के विकास को लेकर आठ सूत्री मांग पत्र सौंपा। मांग पत्र में तुलसी आश्रम को बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद में शामिल करने, रामायण सर्किट से जोड़ने, तुलसी महोत्सव के आयोजन, आश्रम की घेराबंदी, भव्य प्रवेश द्वार निर्माण, गुरुकुल की स्थापना, मानस पुस्तकालय निर्माण, तुलसी सरोवर के सौंदर्यीकरण, तुलसी आश्रम से बाबा ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर तक कॉरिडोर निर्माण तथा प्रमुख धार्मिक शहरों को जोड़ने वाली ट्रेनों का रघुनाथपुर में ठहराव सुनिश्चित करने की मांग शामिल है।
धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
तुलसी आश्रम बक्सर जिले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थल है, जो आज भी कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। सरकारी अभिलेखों एवं शाहाबाद गजेटियर 1966 के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने रघुनाथपुर में प्रवास किया था और यहीं रामचरितमानस के उत्तरकांड के कुछ अंशों की रचना की थी। इसी स्थल को तुलसी आश्रम के नाम से जाना जाता है। आज भी गोस्वामी तुलसीदास के नाम से यहां 4 एकड़ 63 डिसमिल भूमि दर्ज है। आश्रम परिसर में प्राचीन श्रीराम-जानकी मंदिर एवं भव्य महाकालेश्वर मंदिर स्थित हैं। वहीं, मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित बाबा ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
क्या है बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद :
बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद, बिहार सरकार के विधि विभाग के अंतर्गत कार्यरत एक प्रशासकीय संस्था है, जो धार्मिक संस्थानों के हितों और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा का कार्य करती है। यह राज्य के हिंदू मंदिरों और मठों के प्रबंधन, अतिक्रमण से मुक्ति तथा उनके समुचित विकास और कल्याणकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कार्य करती है। साथ ही, धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीय महत्व के पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
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