उत्तरप्रदेश / गाजीपुर । संस्कृति और परंपराओं की गूंज से सराबोर गाजीपुर का लंका मैदान इन दिनों एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना। जीवनोदय शिक्षा समिति के तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “परंपराओं का पुनः प्रतिष्ठापन: भारत एवं विदेशों में आदिवासी और भोजपुरी संस्कृति” विषय पर दो दिनों तक चली और इसमें देश-विदेश से आए विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों और कलाकारों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इस आयोजन ने न केवल भोजपुरी अंचल की सांस्कृतिक धरोहर को विश्व मंच पर प्रस्तुत किया, बल्कि नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने का भी सशक्त संदेश दिया।
सेमिनार का उद्घाटन अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद और अतिथि मंडली की उपस्थिति में हुआ। मॉरीशस से डॉ. सरिता बुद्धु, तुर्की से प्रो. स्मिता जैसल, अमेरिका से डॉ. माइकल बोलोन, और लीबिया से प्रो. अनिल प्रसाद विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रामनारायण तिवारी ने की, जबकि मंच संचालन का दायित्व डॉ. जयशंकर सिंह ने बखूबी निभाया।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सबसे भावुक क्षण तब आया जब बक्सर जिले की दो प्रतिभाओं को विशेष सम्मान से नवाजा गया। भदवर गांव की युवा शास्त्रीय संगीत साधिका कुमारी नंदिता को उनके अनवरत साधना और शास्त्रीय संगीत में अद्वितीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित “विदुषी गिरिजा देवी सम्मान” प्रदान किया गया। नंदिता का संगीत जीवन उनके नाना, दिवंगत राधेश्याम तिवारी से शुरू हुआ था, जिनके मार्गदर्शन में उन्होंने संगीत के सुर और रागों की गहराई को आत्मसात किया। बचपन से संगीत के प्रति उनकी लगन और मेहनत ने उन्हें विभिन्न मंचों पर पहचान दिलाई है। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से डिप्लोमा के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की संगीत प्रवेश परीक्षा में भी उल्लेखनीय रैंक हासिल की। बहरहाल वे दिल्ली विश्वविद्यालय से संगीत में मास्टर्स डिग्री कोर्स कर रही हैं।
इसके साथ ही, कांट गांव के वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश कांटक को भोजपुरी नाटकों और साहित्य जगत में उनके दीर्घकालिक योगदान के लिए “लोहा सिंह सम्मान” से सम्मानित किया गया। कांटक की रचनाओं ने भोजपुरी रंगमंच को नई दिशा दी है और उनकी लेखनी ने ग्रामीण समाज के जीवन, संघर्ष और संवेदनाओं को मुखर आवाज दी है।
सेमिनार के पहले सत्र में प्रो. पुष्कर मिश्रा, प्रो. पी.के. मिश्रा, हिमांशु उपाध्याय, एस.एन. उपाध्याय और चर्चित साहित्यकार नीरजा माधव समेत कई विद्वानों ने मंच साझा किया। इस अवसर पर डॉ. नर नारायण राय की पुस्तक “शासन से स्वशासन तक-मेयर” का लोकार्पण भी किया गया, जिसमें नगरीय निकायों में स्थानीय स्वशासन की यात्रा और चुनौतियों का गहन विश्लेषण है।
दूसरे सत्र में प्रो. आशीष त्रिपाठी, डॉ. सुनील कुमार पाठक, प्रो. विश्वनाथ मिश्र और प्रो. प्रभाकर सिंह ने विचार-विमर्श को आगे बढ़ाया। वक्ताओं ने भारतीय परंपराओं और संस्कृति के पुनरुत्थान में भोजपुरी समाज की महत्ता पर चर्चा की और कहा कि भोजपुरी संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रसार भारतीय लोकजीवन की पहचान को सुदृढ़ करेगा।
सेमिनार की रंगीन छटा सांस्कृतिक संध्या में नजर आई, जहां कवि सम्मेलन में साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। इसके बाद पारंपरिक लोकनृत्यों—धोबियाऊ, गोंड़ऊ, पवरिया—और लोकगीतों की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दूरदराज़ से आए कलाकारों ने भोजपुरी समाज की जीवंत परंपराओं को मंच पर साकार कर दिया।
यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल एक अकादमिक विमर्श का मंच बनी, बल्कि यह संदेश भी दिया कि संस्कृति और परंपराओं का पुनः प्रतिष्ठापन केवल अतीत को संजोने का प्रयास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक धरोहर निर्माण का संकल्प भी है। बक्सर जिले की कुमारी नंदिता और सुरेश कांटक को मिला यह सम्मान स्थानीय समाज के लिए गौरव का विषय है और यह साबित करता है कि छोटे कस्बों और गांवों से निकलने वाली प्रतिभाएं भी वैश्विक मंच पर अपनी दमदार पहचान बना रही हैं।
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