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‘देहाती दुनिया’ के सौ साल पर एमवी कॉलेज में राष्ट्रीय संगोष्ठी, विद्वानों ने आचार्य शिवपूजन सहाय के साहित्यिक योगदान को किया याद


बक्सर । महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में महाविद्यालय परिवार एवं ‘स्त्री दर्पण’, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आचार्य शिवपूजन सहाय स्मृति पर्व समारोह सह राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का केंद्रीय विषय हिंदी साहित्य के प्रथम आंचलिक उपन्यास माने जाने वाले ‘देहाती दुनिया’ के सौ साल रहा। इस दौरान कृति के ऐतिहासिक शताब्दी वर्ष के अवसर पर विशेष पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डॉ. कृष्णा कांत सिंह ने कहा कि साहित्य केवल शब्दों का शिल्प नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विस्तार है। उन्होंने कहा, “साहित्य ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा है।” उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ की सौ वर्षों की साहित्यिक यात्रा को हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।





मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि विमल कुमार ने आचार्य शिवपूजन सहाय के जीवन और साहित्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह ने ‘देहाती दुनिया’ को हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना था। उन्होंने उपन्यास की संरचना और उसके विभिन्न अध्यायों के संदर्भ में भी चर्चा की।

विमल कुमार ने आचार्य शिवपूजन सहाय के राष्ट्रप्रेम को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रहित में सरकारी नौकरी का त्याग किया और जीवनभर हिंदी की सेवा में समर्पित रहे। उन्होंने सहाय जी के स्वामी सहजानंद सरस्वती को लिखे गए दुर्लभ पत्रों तथा मुंशी सदालाल की पुस्तकों से जुड़े प्रसंगों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ‘देहाती दुनिया’ और फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ को साथ रखकर देखने से भारत के ग्रामीण और औपनिवेशिक जीवन की व्यापक तस्वीर सामने आती है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद आचार्य शिवपूजन सहाय की प्रपौत्री लक्ष्मी सहाय ने सहाय जी के पारिवारिक जीवन से जुड़े कई अनछुए पहलुओं को साझा किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की तरह सहाय जी के चिंतन और लेखन का केंद्र भी ग्रामीण जीवन रहा। उन्होंने बताया कि सहाय जी से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियां और पांडुलिपियां आज भी माइक्रोफिल्म के रूप में सुरक्षित हैं। सहाय परिवार से अतुल जी की उपस्थिति ने आयोजन को भावपूर्ण बना दिया।




विषय विशेषज्ञ प्रो. डॉ. मृत्युंजय सिंह ने कहा कि साहित्य की भाषा को समृद्ध बनाने में गद्य की महत्वपूर्ण भूमिका है, जो शिवपूजन सहाय के लेखन में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ की रचना और प्रकाशन से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘मैला आंचल’ से करीब तीन दशक पहले ‘देहाती दुनिया’ का सामने आना हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण घटना थी। उन्होंने सहाय की रचनाओं के वस्तुनिष्ठ पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता जताई।

प्रो. रवींद्रनाथ राय ने प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, शिवपूजन सहाय और भिखारी ठाकुर की साहित्यिक परंपरा को याद करते हुए कहा कि इन साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विकृतियों को सामने रखा। उन्होंने समतामूलक समाज के निर्माण का आह्वान किया। जितेंद्र कुमार ने भी अपने विचार रखे।

संगोष्ठी में युवाओं और शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। बीए सेमेस्टर-5 के विद्यार्थी विकास कुमार तथा एमए हिंदी के छात्र अभिषेक कुमार ने ‘देहाती दुनिया’ के विभिन्न प्रासंगिक आयामों पर विचार रखे।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने किया। समापन पर डॉ. श्वेत प्रकाश ने अतिथियों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। पूरे आयोजन के दौरान मानस सभागार साहित्यिक विमर्श और विचारों के आदान-प्रदान का केंद्र बना रहा।








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