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बक्सर में जदयू जिलाध्यक्ष चुनाव में राजद पृष्ठभूमि वाले डेलिगेट पर गहराया विवाद, जदयू की साख पर संकट! प्रदेश द्वारा जारी 27 नवनिर्वाचित जिलाध्यक्षों की सूची में बक्सर का नाम नहीं, बढ़ी हलचल


बक्सर । जनता दल (यूनाइटेड) में इन दिनों संगठनात्मक चुनाव को लेकर हलचल तेज है। प्रखंड और जिला स्तर पर चुनाव की प्रक्रिया जारी है, लेकिन कई जिलों में हंगामे और विवाद के कारण चुनाव प्रभावित हुए हैं। पार्टी द्वारा सांगठनिक रूप से 52 जिलों का निर्धारण किया गया है, किंतु 1 मार्च को हुए चुनाव में आधे से अधिक जिलाध्यक्षों का चयन नहीं हो सका। कई स्थानों पर एक से अधिक दावेदार सामने आने से स्थिति तनावपूर्ण हो गई और अंततः निर्वाचन मंडल ने मामले को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पाले में डाल दिया। 8 मार्च को प्रस्तावित प्रदेश अध्यक्ष चुनाव से पहले कम से कम 50 प्रतिशत जिलाध्यक्षों का चयन अनिवार्य माना जा रहा है, ऐसे में पार्टी के भीतर लगातार मंथन जारी है।


इसी क्रम में बक्सर जिला सबसे अधिक सुर्खियों में है। यहां जिलाध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान दिनभर भारी बवाल देखने को मिला। एक ओर लगातार कई कार्यकाल से जिलाध्यक्ष रहे अशोक यादव मैदान में थे, तो दूसरी ओर इस बार दर्जन भर दावेदारों ने चुनौती पेश की। चुनाव प्रक्रिया के दौरान अशोक यादव के समर्थकों और विपक्षी गुटों के बीच तीखी झड़प हुई। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। चुनाव के दिन बक्सर का माहौल रणक्षेत्र में तब्दील हो गया और मामला एफआईआर तक पहुंच गया।



विपक्षी दावेदारों ने आरोप लगाया कि उन्हें चुनाव स्थल में प्रवेश से रोका गया। इसको लेकर उन्होंने सड़क जाम कर विरोध प्रदर्शन किया और चुनाव स्थगित करने की मांग उठाई। हालांकि देर शाम निवर्तमान जिलाध्यक्ष अशोक यादव के पुनः निर्विरोध चुने जाने की खबर सामने आई, जिसके बाद समर्थकों ने अबीर-गुलाल लगाकर जश्न मनाया।


दूसरी ओर, विपक्षी गुट ने प्रदेश नेतृत्व के समक्ष साक्ष्यों के साथ निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। इसी बीच बिहार प्रदेश जदयू सांगठनिक निर्वाचन प्रकोष्ठ द्वारा 27 नवनिर्वाचित जिलाध्यक्षों की सूची जारी की गई, जिसमें बक्सर जिले का नाम शामिल नहीं है। इससे विवाद और गहरा गया है।

अब एक नया आरोप सामने आया है। जिलाध्यक्ष अशोक यादव पर यह आरोप लगाया गया है कि जिला अध्यक्ष चुनाव प्रक्रिया में जिन व्यक्तियों — कमला यादव, संजय यादव, अक्षय लाल रावत, हरिराम यादव, वीरेंद्र यादव, संतोष यादव और गौरी शंकर यादव — को डेलिगेट बनाया गया, वे पूर्व में राष्ट्रीय जनता दल की जिला कार्यसमिति में सूचीबद्ध रहे हैं। आरोप है कि जब राजद को जानकारी मिली कि ये लोग जदयू के आंतरिक चुनाव में डेलिगेट बने हैं, तब उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया। अन्य पर भी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।





इन आरोपों के बाद कई गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं—

क्या डेलिगेट चयन से पहले उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि की जांच की गई थी? यदि जांच हुई थी तो ऐसे नाम शामिल कैसे हुए?
यदि जांच नहीं हुई, तो क्या यह संगठनात्मक लापरवाही है?
क्या प्रदेश नेतृत्व को इन नामों की पूर्व राजनीतिक संबद्धता की जानकारी दी गई थी? और यदि नहीं, तो क्या यह निर्णय व्यक्तिगत स्तर पर लिया गया?

विपक्षी गुट का कहना है कि यह मामला अब व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संगठन की साख और कार्यकर्ताओं के विश्वास से जुड़ गया है। उनका सवाल है कि क्या यह महज संयोग है कि दूसरे दल की कार्यसमिति से जुड़े सदस्य जदयू की आंतरिक चुनाव प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाते दिखे, या यह चुनावी गणित को प्रभावित करने की रणनीति थी?

फिलहाल बक्सर जदयू में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। कार्यकर्ता प्रदेश नेतृत्व से पारदर्शिता और स्पष्ट जवाब की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रदेश अध्यक्ष चुनाव से पहले इस विवाद का समाधान किस रूप में निकलता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।








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