बक्सर । संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत इस वर्ष 4 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा। व्रत की तिथि को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कर्मकांड विशेषज्ञ प्रो. मुक्तेश्वर नाथ शास्त्री ने शास्त्रीय प्रमाणों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जीवित्पुत्रिका व्रत के लिए उदयव्यापिनी अष्टमी को मान्यता दी गई है। व्रत का पारण 5 अक्टूबर की सुबह किया जाएगा।
प्रो. शास्त्री के अनुसार निर्णयसिंधु सहित विभिन्न धर्मग्रंथों और पुराणों में जीवित्पुत्रिका व्रत के लिए सूर्योदय के समय विद्यमान अष्टमी तिथि को प्रमुख माना गया है। महर्षि कात्यायन के मत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी सूर्योदय के समय थोड़े समय के लिए भी विद्यमान हो तो उसी दिन व्रत करने का विधान है। कालमाधव में माधवाचार्य के मत के अनुसार भी सूर्योदय के समय अष्टमी रहने पर उसी दिन उपवास और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करना श्रेष्ठ माना गया है।
सप्तमी-विद्धा अष्टमी का निषेध
प्रो. शास्त्री ने बताया कि पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और निर्णयसिंधु आदि ग्रंथों में सप्तमी-विद्धा अष्टमी को व्रत के लिए त्याज्य बताया गया है। शास्त्रीय मत में सप्तमी के संयोग वाली अष्टमी को ‘शल्यदोष’ से युक्त माना गया है। भविष्य पुराण के निर्देश “सप्तमी रहितामष्टमीं चोदयान्विताम्” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सप्तमी से रहित और सूर्योदय के समय विद्यमान अष्टमी ही व्रत के लिए शुद्ध मानी गई है।
जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। माताएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से यह कठिन व्रत रखती हैं। कई महिलाएं निर्जला रहकर भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान से पूजा करती हैं। प्रो. शास्त्री ने माताओं से आग्रह किया कि व्रत एवं पारण के समय का निर्धारण स्थानीय पंचांग और विद्वान आचार्यों के निर्देश के अनुसार ही करें।
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