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शिशुओं की मजबूत रोग-प्रतिरोधक क्षमता संक्रामक बीमारी से दूर रखने में सहायक- winter season





(बक्सर ऑनलाइन न्यूज़):- ठंड के दस्तक के साथ माताओं को शिशुओं व नवजात बच्चों के बीमार होने व उनसे बचाव की चिंता सताने लगती है। नवजात के स्वस्थ शरीर निर्माण के लिए उचित देखभाल सबसे महत्वपूर्ण है। इसे सुनिश्चित करने में सबसे बड़ा योगदान नवजात की मां का ही होता है। लेकिन इसमें थोड़ी सी लापरवाही भी बड़ी परेशानी का सबब बन जाता है और नवजात बार-बार बीमार होने लगता है। जिससे वह शारीरिक रूप से भी शुरुआती दौर से ही बेहद कमजोर होने लगता है। बार-बार बीमार होना कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता का भी बड़ा संकेत है। इसलिए, जन्म के बाद शुरुआती दौर में नवजात की रोग-प्रतिरोधक क्षमता समेत अन्य देखभाल को लेकर पूरी तरह सजग रहें। ताकि नवजात स्वस्थ रहे और आगे भी उसके स्वस्थ शरीर का निर्माण हों। इसके लिए नवजात की उचित देखभाल के साथ-साथ जन्म के बाद छः माह तक नवजात को नियमित रूप से सिर्फ मां का ही स्तनपान कराएं। इससे ना सिर्फ बच्चे स्वस्थ रहते हैं। बल्कि, उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है।
बच्चों का शारीरिक व मानसिक सर्वांगीण विकास संभव :
आईसीडीएस की डीपीओ तरणि कुमारी ने बताया, उचित पोषण से ही बच्चों का शारीरिक और मानसिक सर्वांगीण विकास होगा और बच्चे स्वस्थ्य रहेंगे। इसलिए, शिशु को जन्म के पश्चात छः माह तक सिर्फ और सिर्फ मां का ही दूध सेवन कराएं। मां का दूध बच्चों के लिए अमृत के समान होता है और स्वस्थ शरीर निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। मां के दूध में मौजूद पोषक तत्व जैसे पानी, प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट मिनरल्स, वसा, कैलोरी शिशु को न सिर्फ बीमारियों से बचाते हैं, बल्कि उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। साथ ही बच्चे की पाचन क्रिया भी मजबूत होती है। इसलिए, मां के दूध को शिशु का प्रथम टीका कहा गया है। जो छह माह तक के बच्चे के लिए बेहद जरूरी है। वहीं, छह माह के बाद बच्चे के सतत विकास के लिए ऊपरी आहार की जरूरत पड़ती है।
जन्म के एक घंटे के अंदर नवजात को पिलाएं मां का दूध :
नवजात के स्वस्थ शरीर निर्माण के लिए जन्म के बाद एक घंटे के अंदर नवजात को मां का दूध पिलाएं। इसके सेवन से नवजात की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। किन्तु, जानकारी के अभाव में कुछ लोग इसे गंदा या बेकार दूध समझ नवजात को नहीं पिलाते है। जो महज एक अवधारणा है। जबकि, सच यह है कि मां का पहला गाढ़ा-पीला दूध नवजात के लिए काफी फायदेमंद होता है। नवजात को छः माह के बाद किसी प्रकार का बाहरी या ऊपरी आहार दें। छः माह तक सिर्फ और सिर्फ मां का ही स्तनपान कराएं। इसके अगले कम से कम से कम दो वर्षों तक ऊपरी आहार के साथ मां का स्तनपान भी जारी रखें। ताकि बच्चे का पूरी तरह से सर्वांगीण विकास होने में मदद मिल सके।


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